फतेहपुर। Indian Premier League के शुरू होते ही जिले में सट्टेबाजी का काला कारोबार चरम पर पहुंच जाता है। देवीगंज का पन्ना मार्केट इस अवैध खेल का एपिक सेंटर बन चुका है, जहां शाम होते ही मोबाइल फोन की घंटियां घनघनाने लगती हैं और लाखों रुपये का खेल शुरू हो जाता है।
रोज बदलते ठिकाने, बेखौफ संचालित नेटवर्क
सट्टेबाज पुलिस की नजरों से बचने के लिए रोजाना अपना अड्डा बदलते हैं। कभी होटल, कभी रेस्टोरेंट तो कभी बंद कमरों में बैठकर पूरे नेटवर्क को ऑपरेट किया जाता है। इसके बावजूद स्थानीय पुलिस को भनक तक न लगना गंभीर सवाल खड़े करता है।
सुबह 11 बजे होता है हिसाब-किताब
सूत्रों के मुताबिक रातभर चले इस खेल का पूरा हिसाब सुबह किया जाता है। करीब 11 बजे तक हार-जीत का निपटारा कर रकम का लेन-देन कर दिया जाता है।
कीपैड फोन और व्हाट्सएप का खेल
पुलिस से बचने के लिए सट्टेबाज स्मार्टफोन से ज्यादा कीपैड फोन का इस्तेमाल करते हैं, ताकि लोकेशन ट्रेस न हो सके। वहीं व्हाट्सएप के जरिए 10 हजार से लेकर लाखों रुपये तक की आईडी बनाई जाती है, जिन पर पूरा सट्टा चलता है।
नाबालिगों को बना रहे शिकार, गिरवी तक पहुंची बात
इस अवैध धंधे में सबसे ज्यादा नुकसान युवाओं और नाबालिगों का हो रहा है। आसान पैसे के लालच में फंसकर कई युवा कर्ज में डूब रहे हैं। हालात यह हैं कि साइकिल और मोबाइल तक गिरवी रखकर पैसा चुकाया जा रहा है। रकम न देने पर सट्टा माफिया द्वारा लगातार उत्पीड़न की शिकायतें भी सामने आ रही हैं।
पुराने आरोपियों का दबदबा, फिर भी कार्रवाई नहीं
बताया जा रहा है कि एक पूर्व सभासद, जो पहले भी कई बार पुलिस गिरफ्त में आ चुका है, इस पूरे नेटवर्क का मास्टरमाइंड है। उसके साथ एक ज्वैलरी और रेडीमेड गारमेंट कारोबारी भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
देवीगंज से राधानगर तक फैला जाल
देवीगंज, राधानगर और पनी मोहल्ले तक यह नेटवर्क पूरी तरह फैल चुका है। जानकारों का कहना है कि अगर इन सट्टेबाजों के मोबाइल खंगाले जाएं, तो पूरे रैकेट का खुलासा हो सकता है।
पुलिस पर संरक्षण के गंभीर आरोप
सबसे बड़ा सवाल पुलिस की भूमिका को लेकर उठ रहा है। स्थानीय थानों और चौकियों के कुछ करखासों पर सट्टेबाजों को संरक्षण देने के आरोप लग रहे हैं। यही वजह है कि इतना बड़ा नेटवर्क खुलेआम संचालित हो रहा है और पुलिस-एसओजी व सर्विलांस टीम पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है।
हाईटेक जाल, लेकिन पुलिस बेखबर या लाचार?
सट्टेबाज हाईटेक तरीकों—कोड वर्ड, डिजिटल पेमेंट, व्हाट्सएप आईडी और लगातार बदलती लोकेशन—का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके बावजूद कार्रवाई का अभाव यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर यह लापरवाही है या मिलीभगत।
बड़ा सवाल—कब जागेगा सिस्टम?
जब पूरा शहर इस अवैध खेल से वाकिफ है, तो क्या पुलिस को सच में कुछ नहीं दिख रहा? अगर जल्द सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह सट्टेबाजी का जाल आने वाले समय में और भयावह रूप ले सकता है।

