
आज की कड़वी हकीकत, चरक चौराहे का वो दर्दनाक मंज़र,
संवाददाता इरफान कुरैशी,
लखनऊ। मुहर्रम का चांद सिर्फ एक तारीख नहीं बदलता वह कायनात के दिल में एक गहरा ज़ख्म हरा कर देता है। यह वो महीना है जिसके आते ही हवाओं में एक सन्नाटा सा छा जाता है और इंसानी रूह खुद-ब-खुद उस अज़ीम शहादत के ग़म में डूबने लगती है। लेकिन अफ़सोस आज का डिजिटल दौर आज की तड़क-भड़क और आधुनिकता की अंधी दौड़ हमें एक ऐसे मोड़ पर ले आई है जहाँ हम इमाम का ग़म मनाने नहीं बल्कि अपनी रूहानी विरासत का जनाज़ा उठाने लगे हैं। ज़रा ठहरिए, अपनी आँखें बंद कीजिए और आज के इस बनावटी शोर से दूर कर्बला की उस तपती रेत पर चलिए जहाँ इंसानियत का सबसे बड़ा इम्तिहान हुआ था।
ज़रा सोचिए उस मंज़र के बारे में, जहाँ चारों तरफ तपती हुई रेत थी, सूरज आग बरसा रहा था और फुरात के पानी पर पहरे थे। तीन दिन की कड़कती प्यास थी, सूखे हुए हलक थे और छः महीने के अली असग़र की वो मासूम सी पुकार थी। एक तरफ ज़ुल्म का वो पहाड़ था जिसके पास हुकूमत थी, फौज थी और हथियारों का गुरूर था, और दूसरी तरफ फातिमा के लाल इमाम हुसैन थे, जिनके पास सिर्फ सब्र ईमान और हक़ की ताकत थी। एक-एक करके 72 साथी कुर्बान हो रहे थे, लेकिन हुसैन के पैर नहीं डगमगाए। जब तीरों की बौछार के बीच आख़िरी वक्त आया, तो इमाम ने तलवार नहीं उठाई, बल्कि अपने मालिक के हुज़ूर सजदे में सिर रख दिया। वह सजदा कोई हार नहीं था, वह ज़ुल्म के सीने पर गाड़ा गया सत्य का वो परचम था जो कयामत तक लहराता रहेगा। हुसैन ने अपना लहू देकर इस्लाम के बाग को सींचा था।
अब कर्बला के उस मंज़र से लौटकर अपने बचपन के उन दिनों को याद कीजिए, जब भारत की इस पाक सरज़मीन पर मुहर्रम का चांद देखते ही आँखें नम हो जाती थीं। उन दिनों दिखावा नहीं, दिलों में इमाम का दर्द होता था। अज़ाखानों पर काले परदे लटकते थे और उनके भीतर मद्धम गति से जलते हुए चिराग या मोमबत्तियां होती थीं। वो धीमी सी रोशनी और वो सन्नाटा सादगी का ऐसा मंज़र बयां करता था कि देखने वाले की रूह काँप जाती थी। घरों के चूल्हे ठंडे हो जाते थे, लोग ज़मीन पर सोते थे और सादे बर्तनों में बनी दाल-रोटी को ही बड़े अदब से तबारक समझकर बांटते थे। वहाँ कोई दिखावा नहीं था, सिर्फ एक सच्चा, ख़ामोश और रूहानी मातम था जो सीधे दिल से निकलता था।
लेकिन आज के मुसलमान को देखिए, हम अपनी इस पाक रवायत को भूलकर किस रास्ते पर जा रहे हैं? पिछले साल 8 मुहर्रम की रात जब आँखों ने चरक चौराहे और उसके आस-पास का नज़ारा देखा, तो रूह भीतर तक काँप उठी। वह शहज़ादे अली अकबर और गाज़ी अब्बास की याद की रात थी, लेकिन वहाँ का मंज़र देखकर ऐसा लग रहा था मानो हम हुसैन के रास्ते से कोसों दूर भटक चुके हैं। चारों तरफ सड़कों पर लगे बड़े-बड़े डीजे साउंड और शादियों जैसी झिलमिलाती, चकाचौंध पैदा करती रंग-बिरंगी लाइटें लगी थीं। जिन मर्सियों और मातम की आवाज़ों को सुनकर सीना छन जाना चाहिए था, आज उन्हें डीजे की थिरका देने वाली भारी धुनों पर बजाया जा रहा था। नौजवान उन तेज़ आवाज़ों के बीच मातम नहीं, बल्कि एक मनोरंजन और हुड़दंग कर रहे थे। वो चकाचौंध करती लाइटें अंदर से इंसान की रूह को जला रही थीं और सवाल कर रही थीं। क्या इसी मुसलमान के लिए हुसैन ने अपना भरा-पूरा परिवार की कुर्बानी दी थी? क्या यह अकीदत है या अनजाने में इमाम की शान में घोर गुस्ताखी?
अगर हम हुसैन के मर्तबे को एक पल के लिए भी समझ लें, तो हमारे सिर शर्म से झुक जाएंगे। हुसैन वो अज़ीम शख्सियत हैं जिन्हें नबी-ए-पाक (स.अ.व.) ने जन्नत के जवानों का सरदार कहा। वो हुसैन, जो जब बचपन में रसूल की पीठ पर बैठ जाते थे, तो नबी अपने सजदे को लंबा कर दिया करते थे ताकि नबासे को कोई तकलीफ न हो। जिसके अदब का ख्याल, अल्लाह पाक का रसूल रखे, आज हम उसके ग़म को सड़कों पर डीजे बजाकर तमाशा बना रहे हैं? हुसैन का रास्ता तो पेट पर पत्थर बांधने का रास्ता था, सच के लिए अपनी गर्दन कटाने का रास्ता था। हुसैन ने सजदे में सिर कटाकर नमाज़ की हिफाज़त की थी, और हमारा हाल यह है कि हमारे चौराहों पर डीजे का शोर है, हमारी नमाज़ें कज़ा हो रही हैं और हमारा चरित्र गुनाहों से काला हो चुका है। हम हुसैन को तो मानते हैं, लेकिन अफ़सोस, हम हुसैन की एक भी नहीं मानते!
हुसैनियत कोई दस दिन का मेला या त्योहार नहीं है जिसे मुहर्रम बीतने के बाद उतारकर अलमारी में बंद कर दिया जाए। अगर हम सच्चे हुसैनी हैं, तो हमें साल के 365 दिन हुसैनी बनकर जीना होगा। हुसैनी रास्ते पर चलने का मतलब है। पूरे साल झूठ, फरेब, बेईमानी और हराम की कमाई से दूर रहना। इसका मतलब है समाज के भूखों को खाना खिलाना, कमज़ोरों का साया बनना, दिलों में मोहब्बत पैदा करना और हर उस बुराई से तौबा करना जो इंसानियत को कलंकित करती है।
भले ही हम रास्ते से भटक गए हैं, भले ही हमें लौटने में देर हो गई है, लेकिन अगर आज भी हम संभल जाएं, तो इमाम की रहमत का साया हमें समेट सकता है। आइए, इस मुहर्रम हम सब मिलकर अपने इन गुनाहों और दिखावे की झूठी रवायतों से सच्ची तौबा करें। खुदा के हुज़ूर गिड़गिड़ाकर दुआ करें। ऐ परवरदिगार! हमें दिखावे और इस भटकाव की हरामकारी से बचा। हमें वैसा हुसैनी बना जैसा इमाम हुसैन हमसे चाहते थे। हमें पूरे साल उस सादगी और सीधे रास्ते पर चलने की तौफीक दे जो कर्बला की पाकीज़गी से होकर गुज़रता है। आइए, इन शोर-शराबे वाले डीजे और नुमाइशी लाइटों को हमेशा के लिए अलविदा कहें और अपने पुरखों की सादगी, अदब और उस सच्चे आत्मिक ग़म को वापस लाएं, क्योंकि हुसैन दिलों में बसते हैं, सड़कों के शोर में नहीं।




