
जिला संवाददाता देवेंद्र तिवारी
उन्नाव (नवाबगंज)।
यह खबर किसी हॉरर फिल्म का सीन नहीं, बल्कि हकीकत है उन्नाव का स्वास्थ्य महकमा डेंगू के खिलाफ जंग में खुद ‘बीमार’ नज़र आ रहा है।
जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र नवाबगंज में बना डेंगू का विशेष ईटीसी वार्ड इन दिनों तालों में कैद है जबकि कागजों पर इलाज और ड्यूटी दोनों चल रहे हैं।
वार्ड बंद, इलाज बंद… पर वेतन चालू!
डेंगू मरीजों के इलाज के लिए जिस वार्ड को बनाया गया था,
वह अब धूल और मकड़जाल से ढका हुआ है।
दरवाज़े पर ताला लटक रहा है लेकिन फाइलों में सब कुछ “सक्रिय” बताया जा रहा है।
तीन स्वास्थ्यकर्मियों में से एक ने इस्तीफा दे दिया,
बाकी दो सिर्फ “कागज़ों पर” ड्यूटी पर हैं।
ना मरीज़, ना डॉक्टर, बस “औपचारिकता” का इलाज जारी है।
सिकंदरपुर केस बना शर्मनाक उदाहरण
हाल ही में सिकंदरपुर गांव में एक किशोरी डेंगू पॉज़िटिव पाई गई।
स्वास्थ्य टीम पहुंची स्प्रे किया, कुछ फोटो खिंचवाई, और लौट गई।
किसी को नहीं पता कि उस किशोरी का इलाज कहां हुआ, या हुआ भी कि नहीं!
कागज़ी जंग, ज़मीनी नाकामी
शनिवार को डेंगू फैलने की जानकारी मिलने के बाद भी
नवाबगंज का डेंगू वार्ड बंद ही रहा।
स्वास्थ्य विभाग का पूरा फोकस “रिकॉर्ड अपडेट” करने में रहा
ना निगरानी, ना मरीज़ों की देखभाल,
बस रिपोर्ट में “सब सामान्य” का ठप्पा।
सवाल बहुत हैं, जवाब कहीं नहीं
क्या स्वास्थ्य विभाग सिर्फ फाइलों में सक्रिय है?
क्या डेंगू वार्ड का “ताला” अब जिले की व्यवस्था का प्रतीक बन गया है?
जब मरीज़ नहीं, इलाज नहीं — तो फिर वेतन किस बात का?
स्थानीय नागरिक बोले:
“डेंगू का डर हर घर में है, लेकिन अस्पताल में सन्नाटा है।
लगता है इलाज अब कागज़ों में ही मिलेगा।”


