
शहीद रफ़ीक खान के बलिदान को नमन, गूँजी हक की हुंकार,
संवाददाता इरफान कुरैशी,
लखनऊ। कुछ शख्सियतें अपनी मौत के बाद और भी ज़िंदा हो जाती हैं। नक्खास की सरज़मीं पर जब शहीद अब्दुल रफ़ीक खान की 21वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धासुमन अर्पित किए गए, तो वहाँ मौजूद हर शख्स की आँखों में एक चमक थी, संघर्ष की चमक और अपने हक के लिए मर-मिटने वाले उस नायक के प्रति गहरा सम्मान।
कार्यक्रम में संगठन के अध्यक्ष नदीम सिद्दीकी, इसी संगठन के वरिष्ठ कार्यकर्ता भी मौजूद रहे, अहमददीन कुरैशी,व राजेश कपूर,आरिफ खान,सुनील कुमार तिवारी,मो वसीम, अख्तर जमाल,मो शुऐब,मनीष सेठ,मो मोईन,अमरनाथ शर्मा,नूरुद्दीन गुड्डू,रईस मुन्ना,धीरज गुप्ता,वकील अहमद,अनवारुल हसन,जमीर अहमद,एक रूहानी गहराई तब आई जब मौलाना ने बाज़ार को महज़ खरीद-फरोख्त की जगह नहीं, बल्कि ‘इबादतगाह’ की तरह पेश किया। उन्होंने अपने शब्दों में वह वज़न पैदा किया जिसने सबके दिलों को छू लिया, बाज़ार वह धागा है जो हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई को एक माला में पिरोता है। हमारी असली ताकत व्यापार नहीं, बल्कि वह साम्प्रदायिक सौहार्द है जिसे अब्दुल रफ़ीक खान ने अपने खून से सींचा था।
भाजपा के वरिष्ठ नेता और व्यापारियों के संरक्षक अजय त्रिपाठी ‘मुन्ना’ के संबोधन में एक अभिभावक जैसी गंभीरता थी। उन्होंने शहीद के परिवार और पूरी व्यापारी बिरादरी को ढांढस बंधाते हुए कहा कि शहीद रफ़ीक साहब का आत्मदाह कोई हार नहीं, बल्कि व्यापारियों की सुरक्षा के लिए रखी गई एक मज़बूत नींव थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि संगठन का निर्माण ही इसीलिए हुआ है ताकि शासन-प्रशासन के सामने व्यापारियों की आवाज़ कभी कमज़ोर न पड़े।
संगठन के अध्यक्ष नदीम सिद्दीकी ने उन 39 दिनों के संघर्ष की याद दिलाते हुए सभा में एक नई ऊर्जा भर दी। उनके वक्तव्य में वज़न तब और बढ़ गया जब उन्होंने व्यापारियों को सचेत किया, हमारी एकता ही शहीद रफीक साहब को सच्ची श्रद्धांजलि है। 1800 दुकानदारों का यह कुनबा अगर बिखरा, तो संघर्ष कमज़ोर पड़ेगा। हम रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के सहयोग से बाज़ारों को संवार रहे हैं, लेकिन हमारी सबसे बड़ी शक्ति हमारा आपसी भाईचारा है।
साहब एक्शन कमेटी के अध्यक्ष अब्दुल वहीद फ़ारुक़ी और अन्य वक्ताओं ने भी इस बात पर जोर दिया कि नक्खास का यह बाज़ार आज जिस सम्मान के साथ खड़ा है, उसके पीछे एक इंसान की रूह का वह जलता हुआ हिस्सा है जिसने व्यापारियों के शोषण के विरुद्ध खुद को आग के हवाले कर दिया था।
यह श्रद्धांजलि सभा केवल एक रस्म नहीं थी, बल्कि यह लखनऊ की उस तहजीब का प्रदर्शन था जहाँ एक शहीद के नाम पर राजनीति नहीं, बल्कि प्यार और एकजुटता की इबारत लिखी जाती है। जब तक बाज़ारों में शाम की रौनक रहेगी, शहीद अब्दुल रफ़ीक खान का नाम वक़्त की दिवारों पर जगमगाता रहेगा।




