
उन्नाव। जिले में कोडीन कफ सिरप की कालाबाजारी का मामला दिन-ब-दिन उलझता जा रहा है। हाल ही में सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपी रिटेल विक्रेता द्वारा पेश किए गए इनवाइस में जो ड्रग लाइसेंस नंबर था, वह फर्जी पाया गया है। अब सवाल यह उठता है कि जब फर्जी दस्तावेज पर कार्रवाई की गई थी, तो औषधि निरीक्षक की कार्यवाई कितनी सही थी?
दरअसल, लखनऊ की इधिका लाइफसाइंसेज प्रा. लि. द्वारा उन्नाव जिले में बड़ी संख्या में कोडीन सिरप की बिक्री की पुष्टि हुई थी। इसके बाद अधिकारियों को सूचना मिली कि बांगरमऊ स्थित अजय मेडिकल स्टोर पर 6000 बोतलें बेचने का खेल चल रहा था। उच्च अधिकारियों से मिले इनपुट के बाद जिला औषधि निरीक्षक अशोक कुमार मौके पर पहुंचे थे, लेकिन स्टोर बंद मिला।
संचालक अरुण कुमार को नोटिस जारी कर तीन दिन के भीतर बिक्री संबंधी दस्तावेज़ प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे। तीन दिन के भीतर जब संचालक अशोक कुमार के पास पहुंचे तो उन्होंने अपने पक्ष में साक्ष्य पेश किए, लेकिन ये साक्ष्य भी सवालों के घेरे में आ गए हैं। सूत्रों के मुताबिक, संचालक द्वारा दी गई इनवाइस में जो ड्रग लाइसेंस नंबर था, वह जाली था, जिससे औषधि निरीक्षक की कार्रवाई पर भी संदेह खड़ा हो गया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि 6000 बोतलें कहां गईं? इनकी खपत कहां हुई? कोडीन सिरप का यह खेप उन्नाव में किसे बेचा गया और क्या यह पूरे मामले में एक बड़ा रैकेट है?
उधर, पुलिस ने आरोपी अजय को पकड़ने की पूरी कोशिश की है, लेकिन वह अभी तक गिरफ्त से बाहर है। वहीं, जिला औषधि निरीक्षक अशोक कुमार ने मामले की जांच को लेकर कहा, “हमने जो दस्तावेज़ प्राप्त किए हैं, उसमें फर्जी डीएल नंबर पाया गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।”
अब देखना यह होगा कि इस गुत्थी को सुलझाने के लिए आगे और कितनी जांचें होती हैं और क्या आरोपी गिरफ्तार हो पाते हैं। यह मामला अब केवल कोडीन सिरप की कालाबाजारी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसमें फर्जीवाड़े की परतें भी खुल रही हैं।



