2014 के कुछ पहले से देश में एक ऐसा आख्यान बनाने की कोशिश की जा रही थी, जिसमें भाजपा के नरेन्द्र मोदी के बरक्स कांग्रेस के राहुल गांधी को खड़ा किया जाता था। हालांकि 2014 में नरेन्द्र मोदी भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे और राहुल गांधी एक सांसद से ज़्यादा कुछ नहीं थे। फिर भी भाजपा के निशाने पर गांधी परिवार रहता था और इसमें भी राहुल गांधी तो 2004 से ही, जब वे पहली बार सांसद बने थे, तब से भाजपा के निशाने पर रहते थे। दरअसल भाजपा ने 2014 में कांग्रेस मुक्त भारत की मुहिम छेड़ी थी और उसका यह अनुमान था कि अगर राहुल गांधी को पस्त किया जा सके तो कांग्रेस भी फिर ज्यादा वक़्त तक टिक नहीं पाएगी। 2014 के बाद के जिन चुनावों में कांग्रेस को मात मिलती, उसे भाजपा कांग्रेस मुक्त भारत की तरफ एक और कदम बताती थी। लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ आया कि न राहुल गांधी को झुकाना संभव है, न देश को कांग्रेस मुक्त बनाना। इसके बाद भाजपा की रणनीति बदली और उसके निशाने पर आए क्षेत्रीय दल। चाहे विपक्ष के दल हों या एनडीए में भाजपा के अपने सहयोगी दल, किसी को भी बख़्शा नहीं गया। 2026 में जो पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए हैं, उनके नतीजे इसी रणनीति, इसकी सियासी कहानी का विस्तार कहे जा सकते हैं।

तमिलनाडु, केरल, पुड्डूचेरी, असम और प. बंगाल में 4 मई को आए नतीजे केवल इन राज्यों के लिए नहीं बल्कि समूचे लोकतंत्र के लिए बड़ा संदेश लेकर आए हैं। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक पूरे नतीजे तो घोषित नहीं हुए, लेकिन असम और पुड्डूचेरी में भाजपा की सरकार फिर से बन रही है, प. बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी 15 साल बाद हार रही है, लेकिन भाजपा को बड़ी जीत मिली है, यह ज़्यादा बड़ी ख़बर है। केरल में कांग्रेस 10 साल बाद सत्ता में आ रही है और पहली बार वाम मोर्चा किसी भी राज्य में सत्ता में नहीं है। वहीं तमिलनाडु में भी डीएमके सत्ता से बाहर हो गई है। तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कषगम यानी डीएमके और कांग्रेस गठबंधन अपनी सत्ता बरकरार नहीं रख पाए। लेकिन यहां की परंपरागत राजनीति की तरह इस बार अन्नाद्रमुक को सत्ता नहीं मिली, बल्कि टीवीके बनाकर राजनीति में पहली बार कदम रखने वाले फिल्मों के सुपरस्टार थलापति विजय ने बड़ी जीत हासिल की है।
तमिलनाडु की राजनीति में फ़िल्मी सितारों का बड़ा कद हासिल करना नया चलन नहीं है। लेकिन फिर भी टीवीके की जीत पर आश्चर्य जताया जा रहा है क्योंकि विजय कभी अपनी रैलियों में अव्यवस्था को लेकर, कभी निजी जीवन के विवादों को लेकर सवालों के घेरे में रहे। यह तो माना जा रहा था कि विजय के कारण वोट बंटेंगे और ख़ासकर स्टालिन को नुकसान होगा, लेकिन इसकी उम्मीद नहीं थी कि इतनी बड़ी जीत वो दर्ज करेंगे। बहरहाल, अब वे किस तरह सत्ता संभालते हैं और क्या कांग्रेस किसी तरह इसका हिस्सा बनती है या नहीं, ये देखना होगा। क्योंकि विजय डीएमके विरोधी तो हैं, लेकिन कांग्रेस के लिए अपना झुकाव वे एकाधिक मौकों पर दिखा चुके हैं। अगर कांग्रेस गठबंधन में उन्हें साथ लेती तो शायद तमिलनाडु में समीकरण बदल सकते थे।
बहरहाल, कांग्रेस ने केरल में बड़ी जीत दर्ज की है और उस एलडीएफ़ को हराया है, जिसे राहुल गांधी कई बार भाजपा का सहयोगी बता चुके हैं। केरल में कांग्रेस का मुख्यमंत्री बनेगा यह तो तय है, बस नाम पर मुहर लगना बाकी है। लेकिन इस जीत में कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती भी है कि उसे यहां खाता खोल चुकी भाजपा को और आगे बढ़ने नहीं देना है। क्योंकि भाजपा की शुरुआत कम अंकों से भी हो, तब भी अपनी जायज़-नाजायज़ रणनीतियों और तरीकों से वह बड़े अंक जल्द ही ले आती है। प. बंगाल इसी का उदाहरण है।
2014 में केंद्र की सत्ता में आने के बाद अब नरेन्द्र मोदी के खाते में दो बड़ी सफलताएं जुड़ चुकी हैं। एक तो बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाना और दूसरा प. बंगाल में पहली बार भाजपा की सरकार बनाना। इन सफलताओं में ईवीएम धांधली, एसआईआर और चुनाव आयोग के पक्षपाती रवैये का कितना योगदान है, यह अलग विश्लेषण का विषय है। लेकिन क्षेत्रीय दलों के लिए भाजपा का ऐसा प्रदर्शन अब उनके अस्तित्व के लिए ही बड़ी चुनौती बन चुका है। महाराष्ट्र में भाजपा को शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने सत्ता से बाहर किया तो भाजपा ने पहले शिवसेना और फिर एनसीपी को ही तोड़ दिया। अब इस राज्य में ये क्षेत्रीय दल इतने मजबूत नहीं रह गये हैं कि अकेले भाजपा का मुकाबला कर सकें। हरियाणा में भाजपा ने यही खेल जेजेपी के साथ खेला। ओडिशा में बीजू जनता दल को विपक्ष में बैठने पर मजबूर किया। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल का नाम लालू प्रसाद के कारण बचा हुआ है, लेकिन वह भी कब तक कहा नहीं जा सकता। लोकजनशक्ति पार्टी भी भाजपा ने तुड़वा ही दी है। जनता दल यूनाइटेड भाजपा के साथ सत्ता में है, लेकिन नीतीश कु मार को मुख्यमंत्री की कुर्सी से उतरवाकर भाजपा ने उसे भी ज़मीनी हक़ीक़त से परिचय करा दिया है।
इसी तरह दिल्ली में आम आदमी पार्टी को पहले हराया और अब तोड़ दिया गया है। ले देकर इस समय केवल पंजाब में आप की सरकार है। यहां शिरोमणि अकाली दल भी भाजपा ने ख़त्म ही कर दिया है। अब अगले साल के चुनाव बताएंगे कि यहां कांग्रेस पहले की तरह जीत दर्ज़ करती है या फिर भाजपा के खाते में ये राज्य भी आएगा। यही चुनौती अगले साल उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के सामने होगी, जिसमें वे भाजपा को हरा सके तो समाजवादी पार्टी का अस्तित्व मजबूत होगा। बसपा तो यहां पहले ही भाजपा के सामने घुटने टेक चुकी है। इस वक़्त मेघालय, सिक्किम, मिजोरम, नगालैंड जैसे राज्यों में क्षेत्रीय दलों की सरकारें हैं, जिनमें भाजपा किसी न किसी तरह शामिल है। असम, त्रिपुरा, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश में भाजपा की अपनी सरकार है। झारखंड में झामुमो के साथ कांग्रेस की सरकार है इसके अलावा कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना और अब केरल में भी कांग्रेस सत्ता में है। यानी पंजाब छोड़ किसी राज्य में गैरभाजपाई, गैरकांग्रेसी सरकार नहीं है। इससे 2029 के चुनाव की तस्वीर स्पष्ट हो रही है, जिसमें अब भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने रहेंगे, बाकी क्षेत्रीय दल हाशिए पर ही दिखेंगे।
भाजपा तो यही चाहती थी, लेकिन उसकी इस रणनीति में अब कांग्रेस की मजबूती उभर कर सामने आई है। विपक्ष के सामने अब विकल्प खुला है कि वह कांग्रेस को एकतरफा समर्थन देकर भाजपा से मुकाबले में मदद करे या फिर खुद को सौदेबाजी के लिए पेश कर दे। इन चुनावों के नतीजों से सबक लेकर विपक्ष यानी इंडिया गठबंधन अगर किंतु-परंतु के बिना कांग्रेस को मजबूती दे, तभी लोकतंत्र के बचने की उम्मीद करना चाहिए।



