फतेहपुर ।जनपद के बहुआ ब्लॉक की चक इटौली ग्राम पंचायत में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि यहां सरकारी योजनाएं नहीं, घोटाले के अध्याय लिखे जा रहे हैं।
पिछले 15 सालों से एक ही परिवार की “प्रधानी सरकार” ने गांव की विकास योजनाओं को अपनी कमाई का जरिया बना डाला है।
2010 से लेकर 2025 तक का यह “राज” सिर्फ सत्ता का नहीं, बल्कि सिस्टम पर कब्जे और सरकारी धन की लूट का इतिहास बन चुका है।
भ्रष्ट सचिव की करतूत – RTI का मज़ाक उड़ाया, सूचना को अखबार में लपेट भेजा!
चक इटौली के भ्रष्टाचार की सबसे घिनौनी तस्वीर तब सामने आई जब वर्ष 2023 में शिकायतकर्ता ने आरटीआई के तहत शौचालय और मनरेगा कार्यों का ब्योरा मांगा।
तब ग्राम पंचायत के सचिव राजकुमार ने कानून और नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए सूचना को न्यूज़ पेपर के लिफाफे में डालकर भेजा, ताकि कोई दस्तावेज़ साक्ष्य के तौर पर काम न आए।
शिकायतकर्ता ने इसकी वीडियोग्राफी कर सबूत सुरक्षित रखे हैं, जो सचिव की मंशा और सिस्टम की गिरावट को उजागर करते हैं।
सवाल यह उठता है कि क्या ऐसे सचिव के खिलाफ उच्चाधिकारी सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करेंगे या यह मामला भी ब्लॉक के गोदाम में धूल फांकता रहेगा?
2010 से 2025 – एक परिवार का साम्राज्य, जनता के हक पर डाका!
प्रधानपति ने 2010 में स्वयं प्रधानी संभाली,
2016 में फिर से चुने गए और तीसरी बार महिला सीट आने पर पत्नी के नाम से पंचायत पर कब्जा कर लिया।
पंद्रह साल के शासन में प्रधानपति ने ब्लॉक अफसरों से लेकर स्थानीय नेताओं तक ऐसा नेटवर्क बनाया कि भ्रष्टाचार ही व्यवस्था बन गई।
शौचालय घोटाले का खेल – 45 लाख की रकम का हेरफेर!
2016 से 2020 के बीच शौचालय निर्माण के नाम पर करीब 45 लाख रुपए का गबन हुआ।
जांच में खुलासा हुआ कि 15 लाख रुपए प्रधानपति के खुद के खाते में पहुंचे, बाकी रकम उनके रिश्तेदारों और सहयोगियों के खातों में डलवाई गई।
जनता को स्वच्छता का सपना दिखाकर प्रधानपति ने भ्रष्टाचार की नई मिसाल पेश की।
मनरेगा में फर्जी भुगतान – एक ही दिन में 82 लाख उड़ाए गए!
लोकपाल मनरेगा की जांच में जब अनियमितताओं की पुष्टि हुई,
तो जिला स्तरीय कमेटी ने दोबारा जांच के आदेश दिए।
लेकिन प्रधानपति ने अफसरों की मिलीभगत से एक ही दिन, एक ही घंटे में डोंगल के जरिए 82 लाख का भुगतान करा डाला।
कई रास्तों के टुकड़ों को अलग-अलग दिखाकर पूरा पैसा निकाल लिया गया।
वाह रे सिस्टम! – यहां भ्रष्टाचार भी तकनीक के साथ डिजिटल हो गया है।
सत्ता के संरक्षण में बना सिंडिकेट – अफसरों की मिलीभगत से फलता-फूलता भ्रष्टाचार
2010 से सपा सरकार के दौर में ही प्रधानपति ने अपना दबदबा बना लिया था।
स्थानीय नेताओं से लेकर ब्लॉक स्तर के अधिकारियों तक को “सिस्टम का हिस्सा” बना लिया।
जो सहयोगी बने, उन्हें मलाई मिली — और जो विरोधी हुए, उन्हें ट्रांसफर और जांच का डर दिखाकर खेल से बाहर कर दिया गया।
सीडीओ के आदेश से हिला भ्रष्टाचार का साम्राज्य, सफाई में उतरा प्रधानपति
जैसे ही सीडीओ के निर्देश की भनक लगी, प्रधानपति ने
कुछ मीडिया संस्थानों को साधकर सफाई देने का अभियान शुरू कर दिया।
अब वही कहता फिर रहा है कि “शिकायतकर्ता को खुन्नस है” —
लेकिन सवाल यह है कि अगर सब कुछ पारदर्शी था, तो इतने साल शिकायतों पर खामोश क्यों रहे?
जनता का सवाल – क्या सिस्टम अब भी सो रहा है?
“क्या चक इटौली में सरकारी
योजनाओं का पैसा कुछ लोगों
की जागीर बन गया है?”
“क्या ऐसे भ्रष्ट सचिव और प्रधानों पर कभी कड़ी कार्रवाई होगी?”
“या फिर कागज़ों में खानापूर्ति कर भ्रष्टाचार को वैधता दे दी जाएगी?”
चक इटौली का मामला केवल एक पंचायत का नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल है।
अगर शासन और जिला प्रशासन अब भी चुप रहा, तो यह संदेश जाएगा कि भ्रष्टाचार यहां अपराध नहीं, व्यवस्था का हिस्सा है।
अब वक्त है कि सीडीओ, डीएम और शासन स्तर से इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर, दोषियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए।
क्योंकि सवाल सिर्फ गांव का नहीं — जनता के भरोसे और लोकतंत्र की साख का है।



