
समीर हसन और उनकी मजबूत टीम ने संभाली प्रबंधन की कमान,
सुरूर हसन राज,
लखनऊ। गंगा-जमुनी तहज़ीब और अकीदत के शहर लखनऊ में हर वर्ष की तरह इस बार भी मोहर्रम के मौके पर इंसानियत और सेवा की एक बेहद खूबसूरत तस्वीर देखने को मिली। अवसर था 8 मोहर्रम की मुकद्दस रात का, जब चरक चौराहे पर अजादारों और ज़ायरीन की सेवा के लिए एक विशाल सबील का आयोजन किया गया। यह रिवायत पिछले कई वर्षों से लगातार पूरी शिद्दत, अकीदत और एहतराम के साथ निभाई जा रही है।
यह सबील विशेष रूप से मौला अली और हैदर-ए-कर्रार के पाक नाम से सजाई जाती है, जहाँ आने वाले लोगों के लिए इंतजामिया कमेटी की ओर से बड़े पैमाने पर तबर्रुक का मुकम्मत एहतमाम रहता है। यहाँ अजादारों, ज़ायरीन और राहगीरों के लिए ठंडे पानी व शरबत से लेकर तरह-तरह के लजीज व्यंजनों और पकवानों की व्यापक व्यवस्था की जाती है।

यह सबील मुख्य रूप से उस ऐतिहासिक जुलूस के मद्देनजर लगाई जाती है, जो दरिया वाली मस्जिद से आलम-ए-फ़तह-ए-फ़ुरात पूरे गमगीन माहौल के साथ उठकर चौक क्षेत्र में स्थित गुफरानमआब इमामबाड़े पर जाकर देर रात संपन्न होता है। इस रिवायती जुलूस में हजारों की संख्या में अजादार और अकीदतमंद शामिल होते हैं, जिनकी भूख-प्यास का खास ख्याल रखना और उनकी नि:स्वार्थ सेवा करना ही इस सबील का मुख्य उद्देश्य है।
इस पूरे गरिमामयी आयोजन को सुचारू रूप से संचालित करने, क्षेत्र की स्थिति और सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर सभी इंतजामों को मुकम्मल करने में एक समर्पित और मजबूत टीम दिन-रात मुस्तैद रहती है। पूरे प्रबंधन की मुख्य जिम्मेदारी समीर हसन के कंधों पर होती है, जो लोगों की गरिमा और सुविधा का पूरा ध्यान रखते हुए बेहद संजीदगी से इस पुनीत कार्य को अंजाम देते हैं। इस पूरे सेवा कार्य को सफल बनाने और व्यवस्था को सुदृढ़ रखने में समीर, अली, कमल, राज, डब्बू, कासिम और बॉबी जैसे जिम्मेदार साथी पूरी शिद्दत के साथ डटे रहते हैं और आयोजन के दौरान बड़ी तादाद में मुस्तैदी से अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं।
चरक चौराहे पर होने वाला यह आयोजन महज एक सबील नहीं, बल्कि आपसी सौहार्द, सेवा भावना और शाह-ए-कर्बला की मोहब्बत का एक जीवंत और अटूट उदाहरण है, जो हर साल शहरवासियों के दिलों पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाता है।